है स्वेद जल से जो विभूषित,
इस धरा का जो मान है,
सत्य की जीवन कला है,
और धरा का जो ज्ञान है,
कटु वचन की है जिसकी व्यथा,
घात प्रतिघात की जिसकी कथा,
एक दृढ़ संकल्प है जिसके मन में,
है सूर्य की तपती किरण जिसके तन में,
इस जहां का जो मान और सम्मान है,
ऐसा है अपना किसान ऐसा है अपना किसान।।
है जो संसार में निर्बल,
पर जग निर्माण में है सबल,
सैकड़ों नींदें हैं जिसकी कुर्बान,
इस सृष्टि का है जो भगवान,
संकटों से भरा जिसका मुश्किल सफर है,
धरती बिछौना और आसमान जिसका घर है,
कर्मों से जो छोड़ता है इतिहासों में निशान,
ऐसा है अपना किसान ऐसा है अपना किसान।।
शोषणो के प्रहार में जो जिया हो,
घूँट विष का हरपल जो पिया हो,
लोकतंत्र में पल पल जो छला गया,
फांसीयों में हरपल जिसका गला गया,
मुश्किलों में भी जो हल चला रहा,
उम्मीदों में हर पल जो पला रहा,
फिर भी माँ भारती पर  है जो कुर्बान,
वो है अपना किसान , वो है अपना किसान ।।
कौशल पांडेय(एम●ए●,प्रथम वर्ष)
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