आदरणीय लोक गायिका जी, 
         आपने जब कभी”का बा” गाया, अनायास ही मुझे वर्षा कालीन असंख्य पीले टर्राते हुए उन मेंढकों का स्मरण हो आया जो सुना है मादा मेंढ़की को रिझाने,लुभाने अपना रंग रूप बदलते फिरते हैं l 
        तर्कसंगत तथ्यों, पंक्तियों के लिए सराहना करती हूँ परंतु इन्हें गाने और बनाने के पीछे जो भी आपने तर्क दिए उन से पूर्णतः असहमत हूं, यूं मानिए बिल्कुल असंगत से लगते है l
       इन गीतों में जिन घटनाओं का जिक्र है,वह जब घटित हो रही थी तब काश ! आपने इससे संबंधित एक भी गीत गाया होता तो शायद परिस्थितियां कुछ अलग सी, 
कुछ संतोषप्रद सी होती जब आपके गीतों से लोग जागृत हो लोग एकजुट हो जाते, पीड़ित  मरहम और न्याय दोनों समय पर पाते और तब हुक्मरानों के कानों पर जूं नहीं बिच्छु रेंगता “बिच्छु”l
      पर  अफसोस कि तब यह आपके लिए यह जन चेतना का विषय नहीं था, इनसे पीड़ितों की पीड़ा की तड़प आपको झकझोरना तो दूर , छू कर भी न जा सकी और तब आप सिर्फ ननद-भोजाई और देवरा- पियवा के गीत गाने में इस कदर व्यस्त दिखी मानो और चहुँओर सुशासन की गंगा प्रवाहित हो रही हो l
      कोरोना की दूसरी लहर में  जब खुद आपकी माताजी  व्याधि से ग्रसित  हो छटपटा रही थी, तब असहाय हो जिस प्रकार आपने मदद की गुहार लगाई ,तो लगा था मुझे कि अब औरों के इस कष्ट का अंदाजा भी आप भली-भांति लगा पाओगी पर नहीं,  चिकित्सा सहायता पाते ही आपने मानो सोच लिया कि आप भला तो जग भला! तब क्यों गंगा में तैरती लाशों को देख आपके दुःखी,द्रवित हृदय की चित्कार आपके श्री मुख से एक बार भी नहीं सुनाई पड़ी ? 
     हाथरस हो या उन्नाव, एक महिला का दर्द एक महिला से बेहतर भला कौन समझ सकता है? बयाँ कर सकता है? ऐसा सोच गर एक भी लोक गायिका का स्वर मुखरित होता  तो पीड़िता की दशा भी बदल सकती थी और ऐसी घटनाओं पर आह तक न करने वाले लोगों की सोच की दिशा भी l 
     पर नहीं, आपको तो नेताओं की भाँति बस मुद्दे चाहिए,समाधान नहीं l तभी तो चुनावी गाना गा ,फेमस हो फॉलोवर्स बढ़ा  पाओगी अन्यथा इक्के- दुक्के समाज सुधारकों और जनसेवीयों को भी कहाँ इतना नेम और फेम मिल पाता है जितना आपको मिल रहा है और आगे भी मिलेगा l
       आप तो उन दोमुँहे नेताओं से भी दो कदम आगे निकल गयी जो पहले तो संसद में मूक हो बिल पास करवाते है और फिर सड़कों पर जनता को बरगला प्रदर्शन भी करवाते हैl आप न तो किसान आंदोलन में कहीं नजर आयी, न लखीमपुर पर ही कोई सवाल पूछा फिर अचानक से बिहार चुनाव के बाद, सीधे  उत्तर प्रदेश के चुनाव में लोक और लोकतंत्र को लेकर आपकी चिंता, माफ कीजियेगा यही दर्शाती है कि भले  ही फिलहाल आप किसी राजनैतिक दल में न हो पर आपके मन में जनता को लेकर विचार उनसे कतई अलग नहीं है l 
      आपने अपने तर्क में कहा कि आप वह काम कर रही हो जो इस देश की मीडिया को करना चाहिए “शत् प्रतिशत सत्य” है अर्थात अपनी टी.आर.पी. बढ़ाना, जो आपने बखूबी बढ़ाई है,निः संदेहl 
     मुझे याद है कई साल पहले तक गांवों में चुनाव के वक्त रिक्सों और गाड़ियों पर पर बड़े- बड़े भोंपू लगाकर चुनाव प्रचार होते थे जिसमें सभी दल गायक- गायिकाओं से अपनी अच्छाइयों या फिर विपक्षी दलों की बुराइयों के गीत गवा- गवा कर जन समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते थेl 
      अब न तो भोंपूओं का जमाना ही है और न ही प्रचार गाड़ियों की बातें सुनने की किसीके पास फुर्सतl लगभग हर हाथ में मोबाइल है और हर राजनैतिक दल के पास आई.टी.सेल, हाँ,गर कुछ नहीं बदला तो बस गायकों द्वारा गवाए जाने वाले चुनावी गीतों का तरीका l 
     यूँ तो इसमें छुपाने की कोई बात है नहीं, और गर हो भी तो गायिका जी, ये जो पब्लिक है न, सब जानती है………. ! और वैसे भी जब राजनीति में आई. पी.एस., आई. ए. एस., नायक- खलनायक, खिलाड़ी,चायवाले, जज,वकील, गुंडे – माफिया इत्यादि इत्यादि सब अपना भविष्य देख सकते है तो लोक गायिका  के देखे में का बा? 
इति
-निगम झा
सिलीगुड़ी
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