टंगे हुए सामने वालोंकी तार पर सूखते , बेतरतीब से कपड़े
अक्सर बता जाते हैं उनके मन की बेतरतीबी को ,
उल्टे ,सीधे ,अधधुले कपड़े जब सामने सूखतेनजर आते हैं तो खुलती है अक्सर पोल
अधोवस्त्र को सामने की तार पर डाल कर
किसी कपड़े से ना ढक कर,
वह खुद ही अपनी लापरवाह तबीयत
का बयान करते नजर आते हैं,
कि उनकी जिंदगी जो नहीं चल रही सीधी राह पर,
कुछ उबड़ खाबड़ होकर रह जाती है जिंदगी शायद
और वही बेतरतीबी भी नजर आती है उनके कपड़ों में ।अक्सर सूखने के बाद भी नहीं जरूरत
महसूस हो पाती उन्हें उतारने की ,
हवा में झूल झूल कर इशारा करते हैं डगमगाते हैं ,गिरते हैं और पूछते हैं कितना सुखओगे हमें कितना तड़पाओगे कितने रंग यूंही बदरंग कर जाओगे
पर शायद बदरंग हो चुकी जिंदगी के उनके पन्ने
उलझाए रखते हैं उन्हेंऔर वह ध्यान ही नहीं दे पाते ,उन खुशियों की तरफ जो अक्सर सूखने पर ही जो मिलती हैं
गीलापन तो अंदर तक भिगोता रहता है,
खुद को सुखाकर ,तपा कर ही तो निखार आता है
कपड़ों में भी और जिंदगी में भी।
स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा
