सर्दी की वो कड़कड़ाती रातों के बा
धुंध और कुहरे के चादर में लिपटी
खिलखिलाती एक सुबह का स्वागत
भरता मन में एक गुलाबी अहसास है।
ठिठूरती हथेलियों को रहती दरकार
गर्म अंगीठी की थोड़ी गर्माहट की
सर्द हवाओं के थपेड़ों से आहत हो
गुनगुनी धूप की सेंक सुहानी लगती है।
शॉल, स्वेटर की बुनावट से झाँकती
दिल के करीब कुछ मीठी सी यादें
और साथ में हाथ थामे हमदर्द
एक कप चाय का प्याला भाता है।
अदरक के स्वाद में उतर आये
जीवन के गहरे अनुभव सारे,
चीनी की मिठास में आभास
सुनहरे रिश्तों की मुस्कान।
भीनी भीनी दालचीनी की
खुशबू फ़िज़ा को महकाती,
इलायची की लज्जत मन
को सुकून सा दे जाती है।
कड़वे -मीठे घूटों में इसके
ज़िन्दगी की जैसे घुली कहानी है।
इस एक कप चाय के प्याले
से दोस्ती लगती बहुत पुरानी है।
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शैली भागवत ‘आस ‘
