केतली में उफनता पानी साक्षी बनता है
मेरे मन की व्याकुलता का
कूटती हूँ अदरक, मानो, मन ही मार रही हूँ!
कूटे से अदरक की खुशबू ,
फिर भी प्यार निभाती है,
मेरे एहसास खुद में समेटे,
संदेसा तुम तक पहुंचाती है,
आ जाओ, कि शक्कर की नहीं,
तेरी मीठी सी मुस्कान की कमी है!
तुम भूले तो भूले, कि ऐसे ही हो तुम!
कोई बात नहीं, हमें तो याद है, वादा हमारा,
रोज़ बनाती हूँ जो तुम्हारे नाम का,
हर शाम मगर चाय का एक कप-
इंतज़ार करता है तुम्हारा।
यह चाय नहीं, लम्हा है ठहरा सा,
वो लम्हा जो समय की चाल के साथ चलना भूल गया
वो जो बीतते वक्त के साथ गुज़रना भूल गया,
वो लम्हा जो जीना था तुम संग
भाप बन कर उड़ा भी, और,
ठंडी सी चाय में ठहरा सा रह गया।
ऐसा है-कि चाय का एक कप वह नहीं
जो था आज लग रहा- वह तोमर
तुम संग एक पल बिताने का वादा था हमारा
कि, इक पर में जीवन जीने का इरादा था हमारा।
शालिनी अग्रवाल
जलंधर
