अक्सर बदल जाते हैं मायने जिंदगी के बस चंद लम्हों में,
कब अल्हड़ नादान किशोरी चंद मिनटों मेंजुझारू,समझदार और जिम्मेदार बहू का तमगा पहन जाती है।
कब चिरैया सी चहकने वाली गुड़िया, अपने से 4 साल बड़ी ननद की मां स्वरूपा मजबूरन बना दी जाती है।
कब पापा की परी घर की नौकरानी की हैसियत का दर्जा पा जाती है और फिर भी नकारा ठहराई जाती है।
कब मां की लाडली गरमा-गरम नाश्ते में भी कमियां निकालने वाली, खुद सबसे बाद में ठंडा खाकर रसोई समेटने में लग जाती है।
कब नौकरी और घर में तालमेल बैठाती वह समझदार बच्ची हर पल सुनने को मजबूर होती है, तुम कुछ नहीं कर सकती कभी।
कब वो मासूम मन पनीली आंखों से ठठाकर हंस पड़ती है जब सुनती है कहीं हम बहू नहीं बेटी ले जा रहे हैं।
स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा
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