अकेले ही आना हुआ,
अकेले ही जाना होगा,
अकेलेपन के एहसास से दूर रहना होगा।
जैसा होगा एहसास वैसा ही मन होगा।
मन-मस्तिष्क का संगम होगा,
सोचो जरा! अकेले कहाँ हम?
चहुँओर पसरा प्रकृति का नज़ारा।
आस-पास संजोई चीजों का बसेरा,
जीवन की झिलमिल यादें घनेरी,
भूत-भविष्य की न सोच अधूरी,
हरदम कल्पनाओं का उड़न खटोला ,
विचारों का ओजस् विवेक का तेजस ,
पलपल नई डगर के द्वार खोलते,
बांह पकड़कर आस दिलाते,
फिक्र तुझे किस बात की?
जब साथ तेरे दिन-रात हम।
हाँ, सच ही तो है,कहाँ है अकेलापन?
बस फर्क है सोच और एहसास का।
हम मिल कर चलें सदा सर्वदा,
हरपल उसका नमन करें,
जिसने ये सारा सरंजाम दिया।
रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

