आया बसंत लेके उमंग।
मचा है रसरंग अब क्या कहिए।।
कोकिल की तान भौंरों का गान।
फागुन मलंग अब क्या कहिए।।
मद भरे नैन मुखरित हैं बैन।
चल रही फाग अब क्या कहिए।।
दहके टेसू महके महुआ।
बज रही चंग अब क्या कहिए।।
विकसित प्रसून सुरभित दुकूल ।
बाजे मृदंग अब क्या कहिए।।
ऋतुराज पधारे जग करे पहुनाई ।
धरा गगन रंगे बसंती रंग अब क्या कहिए।।
निखरा है रुप खिल रही धूप।।
धरा है प्रसन्न अब क्या कहिए।।
गरे डार हार निकरो तो यार।
फिर मचे हुड़दंग अब क्या कहिए।।
लेखनी थाम कवि करें प्रणाम।
वाणी असीस अब क्या कहिए।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर
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