ऋतु बसंत है,फगुनी बयार चले,
बगियन मा फूलन की बहार है।
1-अमवा की डारी कोयलिया बोले,
शाख शाख पर भौंरा डोले
बयार संग संग धरती-चंदन उड़त है,
लिए संग में सौरभ की गमकाई,
बौरन की आई बहार है।
2- भोले संग गौरा के ब्याह का मेला,
बेर, बेलपत्र,अनार औ गन्ने का ठेला,
मंदिर मंदिर भक्तों का मेला,
भक्तिरस की पड़त फुहार है।
3- फूले, फले महुआ झर-झर बरसे,
अंचरा भरि भरि घर-घर आवे,
खुशबू करत मदहोश,
मन बावरा संभल न पावे,
वो तितली बन जाए,
उड़त गुलाल लाल भए बदरा
फागुन की आई बहार।
4- विरही अकुलाए, मिलन को तरसे,
कितने दिवस से सपने संजोए,
पूरन करने की विधि न सूझे,
रोजी- रोटी की फिकर में उलझे,
मन ही मन प्रिय मिलन की आस है।
5- ऋतुराज करे प्रकृति का सोलह श्रृंगार,
हुलसि हुलसि कर रहि जाए,
आवन कहि गए अजहुँ न आए,
आँखिन में उम्मीद के डोरे,
नारि नवेली करे षोडशोपचार है।
ऋतु बसंत है,फगुनी बयार चले,
बगियन मा फूलन की बहार है।।
रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक रचना,सर्वाधिकार सुरक्षित।
रुद्रपुर सिटी,ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
