यह कैसी रस्म है, यह कैसा रिवाज है।
यह कैसी है प्रथा, जिसमें जकड़ा समाज है।।
बहुत हो गया , अब तो करो बन्द यह प्रथा।
इस दहेज प्रथा से, बर्बाद समाज है।।
यह कैसी रस्म है——————-।।
लगे हैं रुपये बहुत, बेटी की पढ़ाई में।
लिया कुछ ने कर्ज , बेटी की पढ़ाई में।।                     बेटी की शादी में, लिया कर्ज फिर से।
देने को दहेज , बेटी की विदाई में।।
यह कैसी रस्म है——————-।।
कुछ तो समझते है, इसको शान अपनी।
समाज में इज्ज़त, और पगड़ी अपनी।।
बेच देते हैं इसके लिए , जमीन- सम्पत्ति।
देनी पड़ती है बलि भी, बेटियों को अपनी।।
यह कैसी रस्म है——————–।।
कहे दोषी किसको, मगर दोषी है दोनों।
दहेज बन्द करने की , शपथ ले दोनों।।
लड़की भी चुने वर, नहीं दहेज लेने वाला।
कन्यादान ही दहेज है, यह समझे पक्ष दोनों।।
यह कैसी रस्म है——————–।।
साहित्यकार एवं शिक्षक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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