बम का दर्शन (थर्ड पार्ट)
गांधीजी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपने आप को पीड़ा देने की प्रणाली से उन्हें आशा है कि वह 1 दिन विदेशी शासकों का हृदय परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायि बना लेंगे। अब उन्होंने अपने सामाजिक जीवन के इस चमत्कार के प्रेम संहिता के प्रचार के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया है। वे अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर रहे हैं ,जैसा कि उनके कुछ अनुयायियों ने भी किया है। परंतु क्या वह बता सकते हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का हृदय परिवर्तन कर वे उन्हें भारत का मित्र बनाने में समर्थ हुए हैं ? वे कितने ओडायरों, डायरो तथा रीडिंग और इरविन को भारत का मित्र बना सके हैं? यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी विचारधारा से कैसे सहमत हो सकता है कि वह इंग्लैंड को अहिंसा द्वारा समझा-बुझाकर इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार करा लेंगे कि वह भारत को स्वतंत्रता दे दे।
यदि वॉइस राय की गाड़ी के नीचे बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती है तो वह शरारत यदि घायल हो जाते हैं उनकी मृत्यु हो गई होती।ऐसी स्थिति में वॉइस राय तथा राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच मंत्राणा ना हो पाती, यह प्रयत्न रुक जाता उससे राष्ट्र का भला ही होता। कोलकाता कांग्रेस की चुनौती के बाद भी स्वशासन की भीख मांगने के लिए वायसराय भवन के आसपास मंडराने वालों के लिए घृणास्पद प्रयत्न विफल हो जाते। यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सजा पा जाता। मेरठ तथा लाहौर षड्यंत्र और भुसावल कांड का मुकदमा चलाने वाले केवल भारत के शत्रुओ को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं। साइमन कमीशन के सामूहिक विरोध से देश में जो एकजुटता स्थापित हो गई थी गांधी तथा नेहरू की राजनीतिक बुद्धिमता के बाद ही इरविन उसे छिन्न-भिन्न करने में समर्थ हो सका। आज कांग्रेस में भी आपस में फूट पड़ गई है। हमारे इस दुर्भाग्य के लिए वॉइस राई या उसके चाटुकारों के सिवा कौन जिम्मेदार हो सकता है। इस पर भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो उसे भारत का मित्र कहते हैं।
देश में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हें कांग्रेस के प्रति श्रद्धा नहीं इससे वे कुछ आशा भी नहीं करते। यदि गांधीजी क्रांतिकारियों को उच्च श्रेणी में गिनते हैं तो वे उनके साथ अन्याय करते हैं। वह इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस ने जनजागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उसने आम जनता में स्वतंत्रता की भावना जागृत की है क्योंकि उनका यह विश्वास है कि जब तक कांग्रेस में सेनगुप्ता जैसे अदत्त प्रतिभाशाली व्यक्तियों का जो वॉइस राय की ट्रेन उड़ाने में गुप्तचर विभाग का हाथ होने की बात करते हैं, तथा अंसारी जैसे लोग जो राजनीति काम जानते और उचित तर्क की उपेक्षा कर बेतुकी और तर्क हीन दलील देकर यह कहते हैं कि किसी राष्ट्र ने बम से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की – जब तक कांग्रेस के निर्णयों में इनके जैसे विचारों का प्राधान्य रहेगा तब तक देश उससे बहुत कम आशा कर सकता है। क्रांतिकारी तो उस दिन की प्रतीक्षा में है जब कांग्रेसी आंदोलन से ऐसा किया सनक समाप्त हो जाएगी और वह क्रांतिकारियों के कंधे से कंधा मिलाकर पूर्ण स्वतंत्रता के सामूहिक लक्ष्य की ओर बढ़ेगी। इस वर्ष कांग्रेस ने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है जिसका प्रतिपादन क्रांतिकारी पिछले 25 वर्षों से करते चले आ रहे हैं। हम आशा करें कि अगले वर्ष व स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों का भी समर्थन करेगी।
गांधीजी प्रतिपादित करते हैं कि जब-जब हिंसा का प्रयोग हुआ है तब तक सैनिक खर्च बढ़ा है। यदि उनका मंतव्य क्रांतिकारियों की पिछली 25 वर्षों की गतिविधियों से है तो हम उनके वक्तव्यों को चुनौती देते हैं कि वह अपने इस कथन को तथ्य और आंकड़ों से सिद्ध करें। बल्कि हम तो यह कहेंगे कि उनके अहिंसा और सत्याग्रह के प्रयोगों का परिणाम जिनकी तुलना स्वतंत्रता संग्राम से नहीं की जा सकती नौकरशाही अर्थव्यवस्था पर हुआ है। आंदोलनों का फिर वह हिंसात्मक हो या अहिंसात्मक सफल हो या असफल परिणाम तो भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा ही। हमें समझ नहीं आता कि देश में सरकार ने जो विभिन्न वैधानिक सुधार की गांधीजी उनमें हमें क्यों जाते हैं ?उन्होंने मार्ले मिंटो रिफार्म, मांटेग्यू फॉर्म या ऐसे ही अन्य सुधारों की ना तो कभी परवाह की और ना ही उनके लिए आंदोलन किया।
ब्रिटिश सरकार ने तो यह टुकड़े वैधानिक आंदोलनकारियों के सामने फेंके थे जिससे उन्हें उचित मार्ग पर चलने से पथभ्रष्ट किया जा सके। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तो यह घुस दी थी जिससे वह क्रांतिकारियों को समूल नष्ट करने की उनकी नीति के साथ सहयोग करें। गांधी जी जैसा कि इन्हें संबोधित करते हैं कि भारत के लिए वह खिलौने जैसे हैं उन लोगों को बहलाने फुसलाने के लिए जो समय समय पर होमरूल, स्वशासन ,जिम्मेदार सरकार ,पूर्ण जिम्मेदार सरकार ,औपनिवेशिक स्वराज्य से अनेक वैधानिक नाम जो गुलामी के हैं मांग करते हैं। क्रांतिकारियों का लक्ष्य तो शासन सुधार का नहीं है वह तो स्वतंत्रता का स्तर कभी का ऊंचा कर चुके हैं और वह उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के बलिदान कर रहे हैं। उनका दावा है कि उनके बलिदानों ने जनता की विचारधारा में प्रचंड परिवर्तन किया है उसके प्रयत्नों से वह देश को स्वतंत्रता के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ा ले गए हैं और यह बात उनसे राजनीतिक क्षेत्र में मतभेद रखने वाले लोग भी स्वीकार करते हैं।
गांधी जी का कथन है कि हिंसा से प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होकर स्वतंत्रता पाने का दिन स्थगित हो जाता है तो हम इस विषय में अनेक ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जिनमें जिन देशों ने हिंसा से काम लिया उनकी सामाजिक प्रगति होकर उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई। हम रूस तथा तुर्की का ही उदाहरण लें। दोनों ने हिंसा के उपायों से ही सहस्त्र क्रांति द्वारा सत्ता प्राप्त की। उसके बाद भी सामाजिक सुधारकों के कारण वहां की जनता ने बड़ी तीव्र गति से प्रगति की। एकमात्र अफगानिस्तान के उदाहरण से राजनीतिक सूत्र सिद्ध नहीं किया जा सकता यह तो अपवाद मात्र है।
गांधीजी के विचार में असहयोग आंदोलन के समय जो जनजागृति हुई है वह अहिंसा के उपदेश का ही परिणाम था परंतु यह धारणा गलत है और यह श्रेय अहिंसा को देना भी भूल है क्योंकि जहां भी अत्यधिक जनजागृति हुई वह सीधे मोर्चे की करवाई से हुई। रूस में शक्तिशाली जन आंदोलन से ही वहां किसान और मजदूरों में जागृति उत्पन्न हुई।
क्रमशः
गौरी तिवारी
भागलपुर बिहार
