गतांक से आगे 
विनोद ने शपथपत्र का ड्राफ्ट बेला को व्हाट्सएप पर भेज दिया । बेला ने उसे सौ रुपये के स्टांप पेपर पर टाइप करवाकर शिक्षा सचिव रजनीश भटनागर को दे दिया । पांच दिन बाद बेला की विभागीय जांच समाप्त हो गई । उसका निलंबन खत्म करके उसे नौकरी पर पुनः ले लिया । उधर उस बाबू के खिलाफ जांच शुरू हो गयी जिसका इस “कांड” से कुछ लेना देना नहीं था । तभी तो कहा है कि अगर जूते में दम हो तो अपराधी साहूकार और साहूकार अपराधी सिद्ध हो जाता है । 
बेला को तो यह सब एक चमत्कार जैसा लग रहा था । सरकार में ऐसा भी होता है क्या ? उसकी दुनिया तो एक स्कूल ही है जहां पर केवल पठन और पाठन ही होता है । हद से हद कुछ अध्यापक अध्यापिकाएं छोटी मोटी राजनीति कर लेते हैं मगर इस तरह का “कारनामा” तो कोई “महाविभूति” ही कर सकती हैं । इस देश में IAS से बड़ी और कौनसी विभूति हो सकती है । इसीलिए तो इन्हें “राजा” कहा जाता है इस देश में । जिस तरह एक राजा किसी चीज की बस इच्छा भर कर दे तो समस्त दरबारी उस इच्छा की पूर्ति में लग जाते हैं । वह इच्छा जायज है या नाजायज इसकी परवाह कौन करे ? इसी को तो “मिजाज पुर्सी” कहते हैं । इन “आधुनिक राजाओं” ने तो पुराने राजाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है । 
एक दिन सुबह लॉन में रवि धूप सेवन कर रहा था कि विनोद का फोन आ गया । कहने लगा “बेला कई बार कह चुकी है कि वह आपसे मिलकर आभार व्यक्त करना चाहती है । क्या कहूं उसे” ? 
“अरे , इन सब औपचारिकताओं की जरुरत नहीं है । उससे कह दो कि वह मस्त रहे और कुछ नहीं” । 
“ऐसा तो मैं उसे कई बार कह चुका हूं मगर वह मानती ही नहीं है । एक बार मिलना तो पड़ेगा । बहुत जिद्दी है वह” 
“अभी भी” रवि हंसकर कहने लगा । इस पर विनोद भी हंस पड़ा । “बताओ , क्या कहूं उसे” ? 
अगर ऐसा है तो घर पर ही आ जाओ । मृदुला से भी मिल लेगी वह” 
“नहीं नहीं , वह घर पर नहीं आना चाहती है । उसे घर आने में थोड़ा संकोच हो रहा है । और कोई जगह बताओ” विनोद ने आग्रहपूर्वक कहा 
“तो ऐसा करो , यहां से पास में ही एक ’32 माइल स्टोन’ रिजॉर्ट है , वहां मिल लेते हैं । रविवार को ठीक सांय सात बजे” 
“ये ठीक रहेगा । मैं उसे लेकर वहां पर ठीक समय पर आ जाऊंगा” । 
रवि ने फोन रखा ही था कि मृदुला पास में बैठते हुयी बोली “रवि, इस बार यश के बर्थ डे पर क्या गिफ्ट दे रहे हो” ? 
“अरे, यश का बर्थ डे आ गया और हमें कुछ पता ही नहीं ? आप बताओ क्या गिफ्ट देना है उसे” ? 
“बुलेट की फरमाइश है जनाब की । कहता है कि उसके सभी दोस्तों के पास बुलेट है इसलिए उसे भी चाहिए एक बुलेट । उसी से स्कूल जाना चाहता है वह” । 
“अभी तो पंद्रह साल का होगा यश । अभी तो उसका लाइसेंस भी नहीं बनेगा । बिना लाइसेंस के कैसे चलायेगा वह बुलेट” ? 
“आपके रहते अपने बेटे को लाइसेंस नहीं मिले क्या यह संभव है” ? मृदुला ने उलाहना देते हुये कहा । 
“मृदुला, आप समझ नहीं रही हैं । जब नियम ही नहीं है पंद्रह साल के बच्चों के लिए लाइसेंस बनाने का तो इसमें मैं भी क्या कर सकता हूँ ? मैं कोई नियम कानून बनाने वाली संस्था तो हूँ नहीं । नियम कानून तो विधानसभा में बैठकर “माननीय” बनाते हैं । हम तो उन्हें इंप्लीमेंट करते हैं बस ” । 
“जाओ , किसी और को उल्लू बनाओ । मैं सब जानती हूं । आप चाहो तो सब कुछ कर सकते हो । दुनिया भर का जायज नाजायज काम करवा सकते हो मगर अपने बेटे की मोटरसाइकिल का लाइसेंस नहीं बनवा सकते हो ? बड़े आये ‘महाराज जी’ ” ! उसने कृत्रिम रोषपूर्वक कहा । 
रवि भी अब खूब पहचानता था औरतों के हथकंडे । इसलिए वह इन पचड़ो में फंसता ही नहीं था । कहने लगा “देखिए मैडम जी , पहली बात तो यह है कि कानूनन यश का लाइसेंस बनेगा नहीं । और अगर मेरे जोर देने से बन भी जाएगा तो मैं चाहता नहीं कि वह अभी मोटरसाइकिल चलाये । आप देखती नहीं कि लोग किस तरह गाड़ी चलाते हैं इस देश में । कोई ट्रैफिक नियमों का पालन करता है क्या ? कितनी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं प्रतिदिन यहां पर ? हजारों लोग मरते हैं रोज । इसलिए मैं नहीं चाहता हूं कि वह बुलेट चलाये । उसको एक सरकारी कार तो दे रखी है न । उसमें कुछ खराबी आ गयी है क्या” ? 
“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । गाड़ी सही काम कर रही है मगर यश कहता है कि वह मोटरसाइकिल से जाना चाहता है स्कूल । बस , इतनी सी बात है” । 
रवि ने मृदुला को पास खींचते हुये कहा “मैडम, इतनी सी बात नहीं है , ये बहुत बड़ी बात है । लगता है हमारे साहबजादे किसी लड़की को ‘डेट’ पर ले जाना चाहते हैं” । रवि ने मृदुला की आंखों में देखते हुये कहा । 
“चलो हटो , आपको तो हर वक्त मजाक ही सूझता रहता है । ऐसा लड़का नहीं है वो । सबको अपने जैसा समझते हैं आप” और मृदुला भी रवि को देखकर हंस दी । 
“अच्छा तो ठीक है, हम अपने साहबजादे से बात कर उसकी मर्जी का गिफ्ट दे देंगे । अब तो ठीक है” ? 
“अभी ठीक कहाँ है ? अभी तो हमारी भी फरमाइश बाकी है । बहुत दिनों से आपने हमें भी कोई गिफ्ट नहीं दिया है, हां” । मृदुला ने चंचलता से कहा
“अजी हमने तो आपको दो दो अनमोल रतन दिये हैं । एक यश और दूसरी पूर्वी । कहो तो तीसरे गिफ्ट की तैयारी करें” । रवि ने रहस्यमयी मुस्कान बिखराते हुये कहा । 
मृदुला एक झटके के साथ खड़ी हो गई और कहने लगी “जब देखो तब मसखरी करवा लो आपसे तो । पचास के हो रहे हैं जनाब । अभी भी ‘तीसरे’ की ख्वाहिश रखते हो । यह तो नहीं कि दो चार डायमंड के सैट ला दें अपनी इकलौती पत्नी के लिए । बस, जब देखो तब ‘अनमोल रत्नों’ के भंडार को बढ़ाने की बातें करते हो” । और मृदुला रवि का हाथ झटक कर चली गई इस डर से कि कहीं रवि वास्तव में ‘तीसरे’ की तैयारी करना शुरु ना कर दे । 
रविवार का दिन आ गया । विनोद का फोन भी आ गया था । वह ठीक सात बजे पहुंचने वाला था रिजॉर्ट में । रवि ने एडवांस में ही बुकिंग करा ली थी । रवि भी ठीक सात बजे पहुंच गया था ’32 माइल स्टोन’ । वहां पर बेला और रवि उसका इंतजार करते हुये मिले । 
रवि और बेला की नजरें टकराई और बेला की नजरें झुक गई । बेला रवि के पैर छूने के लिए झुकी तो रवि हड़बड़ाकर पीछे हट गया । “अरे रे रे रे, ये क्या कर रहीं हैं आप ? ये पाप क्यों चढ़ा रही हैं मुझ पर ? ऐसा अनर्थ मत कीजिए बेला जी” । 
बेला की आंखों में आंसू आ गये । भरे गले से बोली “क्या मुझे माफी भी नहीं मांगने देंगे आप ” ? 
रवि का स्वर भी कोमल हो गया “कैसी माफी, बेला जी ? जब आपने कोई अपराध किया ही नहीं तो फिर माफी किस बात की ? बचपन में हम लोग बहुत सी शरारतें , नादानियाँ करते हैं । अगर उनको याद करें तो फिर पूरा जीवन माफी मांगने में ही गुजर जायेगा” रवि ने मुस्कुराते हुये कहा । 
“एक तो मैं पहले ही अपराध बोध से ग्रस्त हूँ और उस पर आपने जो यह अहसान किया है, इसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगी” । बेला की रुलाई फूट पड़ी । 
अहसान शब्द से रवि थोड़ा विचलित हो गया । “बेला जी , मैं तो आपको बचपन का साथी मानता हूं और उसी के नाते मैंने यह सब किया था । इसमें अहसान कैसा ? दोस्तों के बीच ये अहसान वहसान नहीं चलता । मेहरबानी करके ऐसे औपचारिक शब्दों से दोस्ती को भारी भरकम मत बनाइये । इसे केवल दोस्ती ही रहने दीजिए” । 
बेला ने गौर से रवि के चेहरे की ओर देखा । कितनी मासूमियत फैली हुयी थी उस चेहरे पर । सरलता और निष्कपटता के उजालों से दमक रहा था रवि का चेहरा । उसमें अपनापन था । अपनी ओर खींचने का अद्भुत आकर्षण था । सालों बाद देखने को मिला था यह चेहरा । बचपन वाला चेहरा ही बसा था उसकी आंखों में । आज उसका दैदिप्यमान चेहरा सूरज की मानिंद लग रहा था । उसके चेहरे पर काली सफेद दाढ़ी खूब फब रही थी । बेला ने अपने पर्स से एक छोटा सा पैकेट निकाला और उसे रवि को देकर कहा “ये एक छोटा सा गिफ्ट लाई हूँ आपके लिये । देखिए , ना नहीं कीजिएगा” । अब बेला के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी थी । निर्मल मुस्कान । जैसे मन का मैल साफ हो गया हो । जैसे गंगग नदी की सफाई होने से वह निर्मल नजर आने लगी हो । 
“अरे , खड़े क्यों हैं आप दोनों ? बैठिये न” विनोद ने तंद्रा भंग करते हुये कहा । तीनों जने एक कमरे में बैठ गये । रवि ने वेटर को तीन कॉफी और कुछ स्नैक्स का ऑर्डर दे दिया । इतने में विनोद का घर से फोन आ गया । वह “एक्सक्यूज मी” कहकर बाहर निकल गया । 
शेष अगले अंक में 
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