अजीब लगता है अपने समाज में।
पुरूष रसोई में,महिला दफ्तर में।
पर इसमें क्या ही बुराई है।
रसोई में पुरुष भी अच्छाई है।
कुछ देवियां बेशक बहाने करती हों।
रसोई के कामों से जी चुराती हों।
पर मांग है आज के समाज की।
दोनों मिल संभाले रसोई और बाहर के काज की।
महिला अगर थक कर आए।
तो पुरूष भी उसका हाथ बंटाए।
पुरूष का जेब हल्का पड़ जाए।
तो महिला उसका हाथ बंटाए।
        -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण
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