जन्म से मृत्यु तक कितना कुछ अपरिचित है
कौन हूँ मैं क्या मेरा मकसद ये अपरिचित है।
मेरे मन पर कब्ज़ा करना सबने चाहा मगर 
मेरे दिल के जज्बातों से सब अपरिचित है।
एक अंधी दौड़ है, ये क्षणभंगूर जीवन यहां
जीने के तौर तरीकों से रहे सब अपरिचित है।
अपनों हुए पराये तो कभी पराये लगते अपने
जाने पहचाने नाते भी लगते कभी अपरिचित है।
देखकर भी मुझे अनदेखा करती आयी है 
ये दुनिया मेरी पहचान से भी अपरिचित है। 
मिट जाते जो उसके ऊपर अपने को मानते 
अपने अभिमान से सब रहते क्यों अपरिचित है।
एक ‘आस’ ही सहारा बन उबर आती है,बाकी 
अंजाम -ए -हयात से सब रहते अपरिचित है।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’
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