वो सूरज की रक्तिम आभा थी,
या धरती का यौवन हरिताभ हुआ। 
वहाँ तरुओं की सरसराहट में भी,
एक मधुर-मधुर शहनाई थी।
चाँद की चाँदनी रातों में, 
तारों की झिलमिल बरसातों में। 
छत के ऊपर बिस्तर लगते,
आती बयार मनभावन थी।
कुछ ओस से गिरती बूँदों में 
कैसी गुंजित सी सरगम थी।
तन भीगा रहता मन भीगा रहता
स्निग्ध धरा शर्माती सी थी।
खेतों की पीली सरसों भी,
स्व यौवन पर इतराती थी।
वहाँ मेेंड़ों पर चलती अबला भी,
थोड़ा-थोड़ा इठलाती थी। 
बूढ़े पीपल – बरगद में
खूब बड़े झरोखे होते थे,
ये मेरे गाँव का यौवन था,
जो बचपन में मैंने देखा था।
काका काकी , दादा दादी
घण्टों हमसे बतियाते थे ,
कुछ अपनी बातें कहते थे,
कुछ उनकी बातें सुनते थे।
नित्य नई कहानियों से,
कितने पाठ पढ़ लेते थे।
जीवन जीने के गुर भी,
यूँ हँसी-खेल में सीखे थे।
अब शहर शहर हम जाते हैं, 
पर कुछ ना ऐसा पाते हैं ,
कितनी भी भीड़ लगी होती 
फिर भी मैं एकाकी ही हूँ। 
मै शहर की आपाधापी में, 
कोई भी अपना नहीं लगता।
यहाँ  तो सब अपने में अकेले हैं, 
पर उर में तो गांव का मेले हैं। 
रचयिता-
सुषमा श्रीवास्तव 
मौलिक कृति
सर्वाधिकार सुरक्षित 
 
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