“बाबा, लो चाय, क्या हुआ बाबा रात में सोए नहीं क्या, आँखें कैसी लाल हो रहीं हैं”
सुशीला ने चाय का गिलास रामप्रसाद के हाथ देते हुए बोला।
“ला दे, सुबह जल्दी उठ गया था, नवीन और प्रवीन उठ गए क्या”
चाय के घूँट को तेज-तेज सुड़कते हुए रामप्रसाद ने सुशीला से पूँछा।
“बाबा वो दोनों तो चाय पी कर गाय और बकरियों को लेकर सुबह जल्दी खेत पर चले गए”
रामप्रसाद ने जल्दी से चाय खत्म की और चारा लाने के लिए एक गन्दी चादर और दराँती लेकर खेतों की ओर चल पड़ा।
रास्ते में चलते हुए उसकी नजर अपने पुराने खेत में धान की लहराती हुई हरी पौध पड़ी, जिसे देखकर उसका दिल रो दिया, अभी पिछले साल अपनी बड़ी बेटी शीला की शादी के एवज़ में २ लाख रुपये गांव के दबंग प्रधान मुरली मिश्रा से ब्याज पर लिये थे बदले में उसे अपनी ३ बीघा जमीन गिरवीं रखनी पड़ी, ये जमीन उसके बाबा और रामप्रसाद को बचपन से बहुत प्यारी थी, पिछले दो महीने से वो मुरली मिश्रा को ब्याज भी नहीं दे पा रहा था, उसे कल शाम को मुरली मिश्रा का संदेश मिला कि अगर ६ महीने तक ब्याज की रक़म नहीं दे पाया तो उसे अपनी जमीन मुरली मिश्रा के नाम लिखनी पड़ेगी।
खेत के किनारे खड़े जामुन और अमरुद के दोनों पेड़ मानो रामप्रसाद को बुला रहे हों, ये दोनों पेड़ उसने अपने बाबा से जिद करके लगवाये थे, जब वो ११ साल का था तब से अब तक ऐसा कोई दिन नहीं गया कि रामप्रसाद दोपहर में इन पेड़ों के नीचे आकर ना लेता हो, बचपन से ही मिट्टी में अपने भविष्य को तलाशने वाले रामप्रसाद ने होश संभालते ही खुद को जिम्मेदारियों की जंजीरों में जकड़ा हुए पाया, १४ साल में बाबा का उसका साथ छोड़ के चले जाना,१५ साल की कच्ची उम्र में आशा से शादी और २५ साल का होते-होते ३ बेटियों और २ बेटों के बाप बन जाना।
अब घर में उसकी बूढ़ी माँ, आशा, दो कुंवारी बेटियों और दो बेटों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी, उसके बोझ से थोड़े झुक गये कन्धों पर कई सालों से है, बूढ़ी माँ की दवाई, बच्चों की पढ़ाई और भरण-पोषण का खर्चा दिन ब दिन बढ़ता जा रहा था, घर में बस एक आशा है, जिसने उससे २ साड़ियों के अलावा कभी कुछ नहीं मांगा, सच में आशा जैसी जीवनसंगिनी ने उसके जीवन के दुर्गम मार्ग को थोड़ा सा सुगम बनाया था।
रामप्रसाद ने अपनी बड़ी बेटी की शादी पिछले साल दो गांव छोड़ पास के ही गांव में एक अच्छे घर में कर दी थी, बेटी बहुत खुश है, बड़ा बेटा १२वीं के पेपर देकर आर्मी की तैयारी कर रहा है, छोटा बेटा अभी ७वीं कक्षा में है और दोनों बेटियां ११वीं और १०वीं कक्षा में हैं, अँगूठा टेक रामप्रसाद ने दिन-रात मेहनत कर बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के लिए हमेशा समझाया, उन्हें आगे बढ़ने की नसीहत दी और उनकी हर जरूरत को पूरा किया लेकिन बेटी की शादी में हुए ख़र्चे ने उसे अंदर से थोड़ा कमजोर कर दिया था।
रामप्रसाद जाकर जामुन के पेड़ के नीचे बैठ गया, आज उसे ऐसा लग रहा था कि मानो अपने बाबा के कंधों पर बैठ के खेत देख रहा हो, उसके बाबा उससे हमेशा कहा करते थे,
“हम अन्नदाता हैं और दाता कभी कमजोर और लाचार नहीं हो सकता, बस बेटा कभी भी मेहनत से मत भागना, तुम्हारी मेहनत तुम्हें कभी हारने नहीं देगी”
ये शब्द रामप्रसाद के जीवनमंत्र बन गए और वो बिना रुके, बिना थके जीवन के इस दुर्गम मार्ग हमेशा पर आगे बढ़ता रहा।
रामप्रसाद ने सोचा था कि अगर बारिश सही समय पर हो गयी तो धान की फसल बेच कर मुरली मिश्रा का पूरा कर्ज़ चुका दूँगा, इसी उधेड़बुन में वो उठकरअपने खेतों की ओर चल दिया, २ महीने से धान की फसल के लिये खाली पड़े खेत ऐसे पथरा गए थे जैसे आँसू खत्म होने के बाद आँखें पथरा जाती हैं, खेत के कोने में खड़ी धान की पौध खेत में रोपे जाने के इंतजार में हल्की सी पीली होकर अपनी हरी रंगत खोने लगी थी, धीरे-धीरे चलने वाली गर्म लू खेतों को धधकने पर मजबूर कर रही थी।
रामप्रसाद ने धान की पौध को अपने हाँथों से ऐसे छुआ मानो कोई माँ अपने बच्चों को दुलार रही हो, उसकी आँखों से ऑंसू गिर के कब खेत को गीला करने लगे उसे पता ही ना चला शायद ये आँसू नहीं एक किसान के सपने थे जो टूट-टूट कर आँखों बाहर निकल रहे थे, तभी उसने देखा कि उसकी छोटी बेटी “बाबा बाबा”चिल्लाती हुई उसकी ओर दौड़ी आ रही थी, किसी अनहोनी को लेकर उसका दिल डूबा सा जा रहा था, उसने ईश्वर से सब कुछ ठीक हो प्रार्थना शुरू कर दी।
“बाबा भोपाल से चिट्ठी आयी है नवीन भईया का आर्मी में सेलेक्शन हो गया है”
सुशीला ने खुशी से झूमते हुए बोला और दूसरे खेत में नवीन और प्रवीन को आवाज देते हुई भाग गई।
रामप्रसाद को अचानक लगा जैसे खेत कुछ गीला सा हो रहा है, उसने आसमान में देखा तो उसके आँसू बारिश की बूंदों के साथ घुल के खेत को गीला कर रहे थे।
उसको अपने बाबा याद आ गए जो शायद इन्ही बूँदों में शामिल होकर उससे बोल रहे थे,
“हम अन्नदाता हैं और दाता कभी कमजोर और लाचार नहीं हो सकता, बस कभी मेहनत से मत भागना, तुम्हारी मेहनत तुम्हें कभी हारने नहीं देगी”
भीगते हुए रामप्रसाद को आज आत्मिक ठंड़क महसूस हो रही थी, उसके तीनों बच्चे बारिश में नाच के जश्न मना रहे थे।
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
