समय बुरा है अपने भी लड़कियों पर बुरी नियत रखते हैं।
यह समाज एवं रिश्तेदार सबके सब खोटी नजर रखते हैं।
दिन अच्छे चल रहें हो तो भी दुष्चरित्र ऐसे नजर रखते हैं।
दुर्दिन की हो बात अगर तो सोचो कैसी यह नजर रखते हैं।
अजनबी अज्ञात लोग तो वैसे भी बुरी गंदी नजर रखते हैं।
ईश्वर का भी डर नहीं रह गया क्या क्या सब करते रहते हैं।
दुश्वार हो गया है लड़कियों का अकेली सफर करना भारी।
सच पर आधारित आज पढ़े एक कहानी मन मेराहै भारी।
सोचा लिखूँ एक कविता कोई जो ये प्रसंग भोगी गई मारी।
लोग पढ़ें एवं पढ़ाएं सबको देखें समाज की गिरावट भारी।
एक पति का हुआ तबादला चेन्नई से मुम्बई वे पकड़े गाड़ी।
वहाँ किए वो ज्वाइन रहने को फ्लैट भी ले लिया था भारी।
पत्नी को है बतलाया अब तुमभी यहाँ आ सकती हो रहने।
मैं ट्रेनटिकट भेज देता हूँ तैयारी करलो आ सकती हो रहने।
पत्नी का भी मन कैसे लगता चेन्नई में अकेली क्या कहने।
एकदिन बैठ गई विवाहिता ट्रेन में पति के पास जाने रहने।
पति को फोन से बताया मैं बैठ गई ट्रेन में ट्रेन लगी चलने।
थोड़ी थोड़ी देर में बातें आपस में दोनों लोग लगे थे करने।
ट्रेन की बोगी में ही सामने सीट पर बैठे थे दो अज्ञात लोग।
कुछ दूर चली ट्रेन तो आपस में बातें करने लगे दोनों लोग।
विवाहिता भी सुन रही थी बातें क्या कर रहे हैं दोनों लोग।
ऐसे लगता था जैसे वह दोनों अज्ञात भी हैं अजनबी लोग।
धीरे-2 बात करें अकेली विवाहिता व दोनों अजनबी लोग।
महिला खाने के समय पर थोड़ा उन्हें भी दिया खाये लोग।
कुछ देर बाद अजनबियों ने स्वयं भी खाना निकाल लिया।
अकेली महिला को भी उसमें से कुछ खाने को जोर दिया।
महिला ने बड़ा मना किया तो अजनबी ने कहा मैंने खाया।
आपने हमें दिया तो मैंने मना नहीं किया उसे लेकर खाया।
अब आप हमारा भी मन रखें तो थोड़ा उसमें से ले खाया।
कुछ देर में नींद लगी सोई जब उठी तो कहीं और है पाया।
एक कार में दो अजनबियों के बीच में स्वयं को बैठा पाया।
उसने कार में ट्रेन के उन्हीं दोनों अजनबी को बैठा है पाया।
महिला ने पूछा हम यहाँ कैसे आये कहाँ ले जा रहेहैं भाया।
अज्ञात कहे चुपचाप बैठी रह जोरसे चांटा भी एक लगाया।
किसी शहर की बदनाम गली में पहुँच बाई को फोन किया।
अज्ञातों ने अनजान शहर के एक कोठे पे ये स्त्री बेंच दिया।
मोबाइल फोन भी ले लिया विवाहिता का तोड़ फेंक दिया।
जिससे कोई पता लगे न इसका ऐसी स्थिति में छोड़ दिया।
बाई के गुंडे इस महिला को ले अन्य स्त्रियों के साथ किया।
सद्चरित्र विवाहिता नारी को जिस्म के धंधे में ढकेल दिया।
कोठे वाली बाई-अन्य लड़कियों जैसे जिस्म बेचने को कहें।
वे कोठे पे आने वाले अपने ग्राहकों को खुश करने को कहें।
जोर जबरदस्ती से यातना देकर ग्राहक के पास भेजी जाए।
फिरभी तो ग्राहक से ये हाथ जोड़ विनती कर लाज बचाये।
इस मजबूर विवाहिता को बिल्कुल भी बात पसंद ना आये।
फोन भी कोई पास नहीं तो ये पति को पीड़ा कैसे बतलाये।
किसी तरह से इस स्त्री का कुछ दिन ऐसे ही बीता कोठे पर।
रो-रो के बुरा हाल हो गया पर गई न इज्जत उसके कोठे पर।
वहाँ पति परेशान बेचारा समझ न आये आखिर ये गई कहाँ।
गुमशुदकी की रिपोर्ट लिखा कर रहता ढूँढता वह कहाँ कहाँ।
एक दिन संयोग से कोठे पे ऐसा भी हेल्पिंग ग्राहक है आया।
उससे भी रो-रो कर इसने अपने पीड़ा व्यथा दर्द को बताया।
उसने कहा तुम चिन्ता छोड़ो यह लो फोन पति से बात करो।
यहाँ का पता बताता हूँ तुम डरो न बिल्कुल सच्ची बात करो।
पति को पता बताया पत्नी ने कहा आओ यहाँ हमें छुड़ाओ।
पति ने कहा धैर्य रखो मैं आता हूँ तुम बिल्कुल ना घबराओ।
पति ने योजना बनाई पुलिस को खबर दे ग्राहक बन पहुँचा।
बाई से बात की कोठे पे मन माफिक लड़की हेतु वह पहुँचा।
रुपया मुँह मांगा दूँगा पर कोठे की हर लड़की को मैं देखूँगा।
मुझको जो पसंद आएगी उसको ही मैं अपने संग में लेलूँगा।
बाई ने सभी लड़कियों को लाइन से कोठे पे खड़ी करवाया।
अपने इस अमीर ग्राहक के सामने बाई ने है परेड करवाया।
पति ने अपनी पत्नी को देखा तब उसके लिए हामी भर दी।
उसे लेके कमरे में गया तो वहाँ से पुलिस को सूचना कर दी।
आगई पुलिस की भारी फोर्स और पड़ गया कोठे पर छापा।
जिस्म के ग्राहक जो जहाँ पड़ेथे लाज शर्म से वहाँ से भागा।
भाग न पाया पर कोई भी जिस्मफरोशी में लिप्त लड़कियां।
वो शौकीन भी भाग न पाए जिन्हें पसंद कोठे की लड़कियां।
समाज के तथाकथित लोगों को क्यों ये समझ नहीं आता है।
इस गंदगी व्यवसाय में कोई खुश मन से कभी नहीं जाता है।
ऐसा कोठा बाई एवं बदनाम गली का ये जिस्मफरोशी धंधा।
हरेक शहर की कुछेक गली में रेड लाइट एरिया में हो धंधा।
कोठा संचालक मंडल के भडुए गुंडे बाई सब पकड़ में आये।
बुरे कर्म और जिस्मफरोशी के धंधा का बुरा फल सभी पाये।
एक बेचारी अकेली विवाहिता महिला की यात्रा का यह दंश।
समझदार ग्राहक की दया और सहयोग से मिटा उसका दंश।
धन्यवाद उस जिस्मफरोशी अड्डे पे आये उस नेक ग्राहक का।
जिसने कोठे पे फसी इस पत्नी को फोन दिया वो ग्राहक था।
धन्यवाद उस क्षेत्र के पुलिस अधिकारी एवं पुलिस फोर्स का।
जो समय पर रेड डाला व निकाला दलदल से उस फोर्स का।
धन्यवाद उस पीड़ित महिला के परेशान इंजीनियर पति का।
जो खबर पा पत्नी की योजनावद्ध छुड़ाने की उस पति का।
ईश्वर को भी धन्यवाद लख लख शुक्रिया इज्जत बचाने की।
इस धंधे में फसी हुई अन्य लड़कियों को वहाँ से छुड़ाने की।
मुझे भी माफ करना यारों मैंने रश्मिरथी पर पढ़ी कहानी थी।
यह एक सच्ची घटना पर आधारित लिखी कोई कहानी थी।
याद नहीं है संभवतः शीर्षक उसका अज्ञात या अजनबी था।
पढ़ा तो मैंने देखा इसमें विवाहिता नारी का दर्द अजनबी था।
मन में आया मैं क्यों ना इसे अपने शब्दों में पंक्तिबद्ध करूँ।
लोग पढ़ें देखें सोचें कभी अजनबी पे कोई विश्वास न करूँ।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज, प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
