अखबार की सुर्खियों मे मेरा नाम चमक रहा था
जिसे देखने को कब से मन तरस रहा था
मेरी बड़ी सी तस्वीर के नीचे मेरा नाम दमक रहा था
और मेरे नाम के साथ ‘कवियत्री ऑफ़ दा ईयर’ सज रहा था
हर अखबार की सुर्खियाँ बस यही दिखा रही थी
मुझे मेरे सपने से अवगत कर रही थी।
मै जो निकली मौहल्ले मे कदम मेरे चल रहे थे
सांसे मेरी दिव्यांग की भांति लडखडा रही थी
अखबार लिये हाथो मे थोड़ा आगे बढ़ी थी
कुछ पडोस की औरते मुझे घेरे खड़ी थी।
मुबारकबाद की झड़ि अभी लग ही रही थी
एक के बाद एक बधाई ही रही थी।
पीछे से दौड़ता एक बच्चा आया
जोर से उसने धक्का दीया।
जोर से फर्श पर आ गिरि
स्वपन से बाहर आ पड़ी
कविता गुज्जर
