“कॉलेज से निकलती हुई नाबालिग लड़की को चार लड़कों ने अग़वा कर किया बलात्कार”
अखबार की खबर पढ़ते ही शुक्ला जी के चेहरे के रंग बदल गए, ये उनके क्षेत्र में इस महीने होने वाली ये ५वीं घटना थी, उन्होंने किचन में नाश्ता बनाती हुई पत्नी को बोला
“अरे और कितना समय लगेगा ? देरी से गया तो विरोधी न जाने क्या-क्या प्रपंच रच लेंगे”
तभी श्रीमती शुक्ला जी आलू के पराठे और चटनी लेकर आ गयीं।
“अरे उन तीनों को भी बुला लो नाश्ते के लिये, तुम्हारे साहबजादे तो अभी उठने वालों में से नहीं हैं”
शुक्ला जी ने अपनी धर्मपत्नी को बोला।
“अरे वो तीनों भी १० बजे से पहले उठने वाले नहीं हैं,आप नाश्ता करके के निकल जाओ”
पत्नी ने उनको चाय का कप देते हुए बोला।
नाश्ता करते हुए शुक्ला जी ने ड्राइवर को जल्दी से गाड़ी निकालने को बोला।
“धीरे-धीरे अब इनको संभालना मुश्किल हो रहा है, इस महीने ये ५वीं वारदात है”
शुक्ला जी ने गंभीर होकर पत्नी से कहा।
“अरे आप चिन्ता मत करिए, ऊपर वाला सब ठीक कर देगा”
श्रीमती शुक्ला उनकी ओर देखकर मुस्कुरा के बोली।
शुक्ला जी अभी १ वर्ष पूर्व ही कानपुर देहात की एक सीट पर विधायक बने थे, उनके एक वर्ष के इस कार्यकाल में आपराधिक मामलों में अपत्याशित बढ़ोत्तरी हुई है, गाड़ी को सीधे थाना प्रभारी डी.के.सेंगर के घर पर लेकर चलने को बोला।
थाना प्रभारी के घर के बाहर खड़े सुरक्षाकर्मी ने अभिवादन किया और गाड़ी को अंदर आने के लिए गेट खोल दिया, शुक्ला जी दरवाज़े की बेल बजायी, अंदर से मिसेज सेंगर ने हल्के पारदर्शी रात्रि वस्त्रों में दरवाजा खोला शायद वो दूधवाले को आया हुआ समझ रहीं थीं, अचानक से सामने शुक्ला जी को देखकर चौंक सी गयीं फिर संयमित होकर हल्के से मुस्कुराके उनका अभिवादन किया और अन्दर आने को बोला, शुक्ला जी ने ना चाहते हुए भी उन झीने वस्त्रों से मिसेज मिश्रा के मादक सौंदर्य का प्रसाद ग्रहण कर ही लिया।
थाना प्रभारी सेंगर जोकि अभी बेड टी की प्रतीक्षा में बेड पर अलसाये हुए पड़े थे, शुक्ला जी के आने की सूचना पत्नी ने उनको बेडरूम में आके दी, बदन पर कपड़े डाल कर विधायक जी के समक्ष उपस्थित हो गए,
“अरे महाराज सुबह-सुबह इस ग़रीब की कुटिया में कैसे पधारे आदेश देते सेवक को आपके दरबार में हाजिर हो जाता”
शुक्ला जी ने अखबार मिश्रा जी सामने रख दिया,
“जवाब देना मुश्किल हो गया है, मीडिया वाले अब घर के बाहर आकर खड़े हो जाते हैं, कुछ कीजिए वरना आपके स्थानांतरण पर मुझे आज ही हस्ताक्षर करने पड़ेंगे”
डी.के.सेंगर ने थोड़ा चिंतित होकर उनसे कुछ समय मांगा, इतने में मिसेज सेंगर शुक्ला जी की पसन्द के प्याज़ के पकोड़े और चाय लेकर आ गयी, प्याज के पकौड़े देखकर शुक्ला जी बहुत खुश हो गए, थोड़ी देर पहले ही अभी आलू के पराठे खाकर घर से निकले थे, लेकिन मिसेज सेंगर के हाथों में कोई तो जादू था,
“भाभी जी ! बहुत ही स्वादिष्ट बनाये हैं पकौड़े”
नाश्ता करने के बाद शुक्ला जी ने ड्राइवर को गाड़ी सीधी महेश वर्मा के घर पर लेकर चलने को बोला।
निशा वर्मा पुत्री महेश वर्मा आयु १७ वर्ष बी ए द्वितीय वर्ष की छात्रा,जिसका कल दोपहर कॉलेज से निकलते हुए अपहरण और बलात्कार हुआ था।
महेश वर्मा के घर का माहौल बहुत भयानक और दर्दनाक था, मानो सन्नाटे ने उस पूरे घर को अपने आगोश में समेट लिया हो, जिस घर की जवान लड़की के साथ ऐसा हादसा हो गया हो उस परिवार को खामोशी और सन्नाटा ही सहारा देता है।
शुक्ला जी गाड़ी से निकल कर वर्मा जी के घर के दरवाजे पर पहुंचे, दरवाजा अंदर से बंद था, रविवार के दिन कोई भी जल्दी नहीं उठता है, कई बार डोर बेल बजाने के बाद दरवाजा खुला सामने महेश वर्मा रक्तरंजित नेत्रों के साथ सामने खड़े थे, शायद कल की घटना से वो रात भर सो नहीं पाये थे।
“निशा बिटिया कहाँ है महेश ?”
“कुछ बातचीत करनी है उससे ?”
“तुम बिल्कुल भी परेशान मत हो, जो कल हुआ है उसमें शामिल हर एक अपराधी को जब तक गिरफ्तार करवा कर कड़ी से कड़ी सजा नहीं दिलवा देता हूँ तब तक मैं अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करूंगा।”
तभी प्याज की पकोड़ों की हल्की सी डकार ने मिसेज सेंगर की याद दिला दी।
महेश वर्मा के सपाट चेहरे पर कोई भी भाव नहीं आया, वो उनको निशा के बेडरूम तक लेकर आ गए, सामने का भयावह दृश्य देखकर शुक्ला जी का कोमल हृदय करुणा से रुदन करने लगा, कमरे के सामने एक १७ वर्षीय दुबली-पतली लड़की पंखे पर अपने दुप्पटे में झूल रही थी, गर्दन खिंच के लम्बी हो चुकी थी और शरीर पर स्याह रंग चढ़ चुका था, मिसेज वर्मा बेड के नीचे बैठी हुईं एकटक अपनी एकलौती बेटी को खामोश नेत्रों से देखे जा रहीं थीं, शायद आधी रात से रो-रो के उनके आँसुओ का सागर भी सुख गया था, लाश को नीचे उतारने का साहस किसी में नहीं बचा था।
चेहरे पर चिंता और करुणा के भाव शुक्ला जी के चेहरे पर साफ दिख रहे थे, अचानक उनकी नज़र स्टडी टेबल पर पड़ी उस पर एक पेपर दबा हुआ था शायद इस पेपर पर निशा के माता-पिता के पास ध्यान देने की शक्ति ही शेष नहीं थी, शुक्ला जी ने वो पेपर आहिस्ता से उठाया और लेकर बाहर आ गए, वो निशा का सुसाइड नोट था, जिसमें कल की घटना का विवरण और अपराधियों के नाम भी अंकित थे, सुसाइड नोट पढ़ने के बाद शुक्ला जी ने एक राहत की सांस ली मानो उन्होंने अपराधियों को अपने कब्जे में ले लिया हो।
शुक्ला जी ने डी.के.सेंगर को फ़ोन करके तुरंत घटनास्थल पर आने को बोला और वर्मा जी को पास बिठाके सांत्वना देने लगे,आंखों से बहते हुए आँसू शुक्ला जी के कोमल हृदय को दर्शा रहे थे, इस भावुक दृश्य को ना जाने कितने ही तीसरी आंख कहलाने वाले कैमरों ने कल के अखबार के लिए कैद कर लिया था।
“जो भी लोग इस घृणित कृत्य में शामिल हैं, उन सभी अपराधियों को जब तब गिरफ्तार नहीं किया जाता है, उनको अदालत द्वारा कठोर से कठोर सजा नहीं दी जाती है, तब तब मैं अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करूंगा, मैं मीडिया से अपील करता हूँ इस घटना को ज्यादा से ज्यादा कबरेज दे ताकि निशा की आत्मा को न्याय मिल सके और अंत में मैं वर्मा जी के परिवार को इस मुश्किल घड़ी में अपनी विधायक निधि से १० लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान करता हूँ और घोषणा करता हूँ जो भी खर्चा इस केस में आयेगा वो मैं व्यक्तिगत रूप से वहन करूँगा, ईश्वर निशा बिटिया की आत्मा को शान्ति….”
कहते-कहते उनका गला भर आया।
जाते समय शुक्ला जी ने डी.के.सेंगर को अकेले में ले जाकर कुछ गंभीर निर्देश दिए और महेश वर्मा की गली से निकलते ही ड्राइवर को गाड़ी डी.के.सेंगर के घर पर लेकर चलने को बोला,शुक्ला जी अपना मोबाइल निकाला,व्हाट्सएप पर मिसेज सेंगर का आमंत्रण हाथ में वाईन की बोतल लिए बुला रहा था, शुक्ला जी ने चेहरे पर एक कामुक मुस्कान लिए ‘आ रहा हूँ ‘ रिप्लाई भेज दिया।
शुक्ला जी ने कुर्ते की जेब से निशा का सुसाइड नोट निकाला शायद वो नोट डी.के.सेंगर को देना भूल गए थे, उन्होंने अपने घर पर पत्नी को फ़ोन लगाया,
“कहाँ हैं चारों गधे, अभी भी सो रहे होंगे इतना सब करने के बाद उस लड़की को जिंदा छोड़ दिया, उनको बोलना घर से बाहर न निकलें, उनकी वजह से आज मेरी कुर्सी जाते-जाते बची है,अगर वो सुसाइड नोट किसी और के हाथ लग जाता तो हम सब जेल में चक्की पीस रहे होते, अपने तीनों भाईयों और अपने बड़े बेटे को समझाओ”
“अरे इस उम्र में तो ऐसी गलतियां हो ही जाती हैं और आप कौन से दूध के धुले हो,आपकी और मिसेज सेंगर की रंगरेलियां घर में सबको पता है, सुबह प्याज़ के पकोड़े कैसे थे ?”
कह कर मिसेज शुक्ला बेशर्मी से हंस दी।
फ़ोन कट करके शुक्ला जी ने सुसाइड नोट को टुकड़े-टुकड़े करके गाड़ी से बाहर फ़ेंक दिया, शायद ये टुकड़े ही निशा की किस्मत में थे कभी इज्जत के टुकड़े और मरने के बाद न्याय के टुकड़े।
डोर बेल बजाते ही मिसेज सेंगर ने कामुक अदा के साथ दरवाजा खोला और शुक्ला जी को अंदर खींच लिया।
उधर खबरों में शुक्ला जी का कोमल स्वरूप वायरल हो रहा था।
✍️✍️ समाप्त ✍️✍️
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
