अंधे की लाठी
बेटे ,तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?मैं तुम्हारी पढ़ाई के लिए कोई कसर नहीं छोडूंगा। रामस्वरूप ने अपने पुत्र जो हाईस्कूल की परीक्षा दे रहा था ,उससे पूछा। क्यों कि रामस्वरूप को रिटायरमेंट में तीन वर्ष ही बचे थे।ओर लक्ष्यदीप उनकी वृद्धावस्था का सहारा था।वो उसे दूर भी नहीं करना चाहत थे। क्यों कि उसके लिए हर चोखट पर गये,मन्नतें ली ।विवाह के दस वर्ष के बाद पत्नी की गोद में लक्ष्यदीप ने जन्म लिया।
पापा मैं इंजिनियरिंग करना चाहता हूं, उसने अपनी ईच्छा जाहिर की।
हां हां बेटा खूब मन लगाकर पढों।गांव की शिक्षा के बाद उसे शहर भेज दिया गया।वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर कंपनी में एक अच्छी सेलेरी पर नियुक्त हो गया। रामस्वरूप ने पत्नी से कहा हम कितने खुशनसीब है, बालक की जल्दी ही नौकरी भी लग गई।
कुछ दिनों बाद कंपनी ने उसे विदेश भेज दिया जहां वह उसी कंपनी की शाखा में कार्य करने लगा।माता पिता भी बहुत खुश हुए।आज बेटा विदेश चला गया। गांव,मोहल्ले के सभी लोग रामस्वरूप को बधाई देने लगे।
एक दिन रामस्वरूप की पत्नी की तबियत अचानक बिगड़ी,ओर बिगड़ती ही चली गई। बालक को फोन किया परंतु उसने तीन माह के पहले आने में अपनी असमर्थता जताई। रामस्वरूप की आंखों में आंसू थे ।पत्नी को बेटे की बहुत याद आ रही थी।उसका नाम पुकार पुकार कर ,उसे याद कर आखिर वह एक दिन चल बसी।लक्ष्यदीप क्रिया कर्म संपन्न होने के बाद पहुंच पाया।मात्र दस दिन की छुट्टी के बाद वह पुनः विदेश रवाना होने लगा।
आज रामस्वरूप उसके जाने से बहुत दुःखी थे, क्यों कि एक तो पत्नी की कमी दुसरी ”अंधे की लाठी ” बेटा भी जा रहा है। बेटे ने पीछे मुड़कर देखा पिता की आंखों में आंसू वह सहन नहीं कर पाया और पिता को आश्वासन दिया कि मैं अब विदेश नहीं जाउंगा। यहीं भारतीय कंपनी में ही अपनी नौकरी करूंगा। ताकि मैं आपको भी अपने पास रख सकूं।पिताजी में आपका एक मात्र सहारा हूं इसलिए आप चिंता न करें।
पिता की आंखों में आंसू पोछते हुए उसने चरण स्पर्श किए और रामस्वरूप ने उसे गले लगा लिया। लक्ष्यदीप उसका एक मात्र सहारा था।आज ईश्वर ने अंधे की लाठी लौटा दी। वह परमात्मा को मन ही मन बहुत साधुवाद देने लगा।
राजेंद्र सिंह झाला
उ.श्रे.शि.
बाग जिला धार मप्र
