कानून तो अंधा ही है।
तभी तो बेगुनाह पाते सजा,
और गुनहगार बच जाते हैं।
सीधे-सादे होते लाचार,
बेईमान खुशी के गीत गाते हैं।
कानून तो अंधा ही है।
तभी तो सरेआम होता,
लूट खसोट,छीना-झपटी।
बाल-अबोध होते असुरक्षित,
फलते-फूलते हैं कपटी।
कानून तो अंधा ही है।
-चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।
