इस दुनिया के हैं रंग निराले,
दिखते हैं सब अपने में मतवाले।
सबके जीने का है अंदाज़ अपना,
पीने-पिलाने का है अंदाज़ अपना।
खाने-खिलाने का भी है अंदाज़ अपना।
तो गमों में भी लुफ्त उठाने का है अंदाज़ अपना।
कोई खुशियों को जीकर भी दुःखी है,
तो कोई दुःख में भी खुशियाँ बिखेरने का रखता है अंदाज़।
जीवन देकर भी जीने का अंदाज़ है अपना ।
अप्राप्त में भी प्राप्य सा आनन्द है निराला।
व्यथा को ओट में रखकर हँसी को लब पर चढ़ाने का अंदाज़ है निराला।
अगले के गम को गले लगाने का अंदाज़ है निराला।
कंजूस के जेब से पैसे निकलवाने का अंदाज़ है निराला।
अरे! ज़िन्दगी जीने का है अंदाज़ अपना अपना।
मुश्किलों से जूझकर मंजिल पाने का अंदाज़ है अपना।
टूटकर भी टूटों को जोड़ने का अंदाज़ है अपना।
राह चलते को भी अपनाने का अंदाज है अपना।
जो कोई न कर सके उसे भी कर गुज़रने का अंदाज़ है अपना।
यूँ ही नहीं पहचान बनती है अपनी,
कुछ अलग अलग से दिखने का ही अंदाज़ है अपना।
कुछ हटकर साबित करने का अंदाज़ है अपना।
ये अंदाज़ ही तो दे जाते हैं पहचान,
विष को भी अमृत का एहसास देना भी है अंदाज है अपना।
यह पृथक पृथक अंदाज़ ही तो दे जाते हैं कायाकल्प समाज को
जिसे हम आप जी लेते हैं अंदाज़ अपना अपना कर।
अरे एक ही डगर पर चलाते हैं अंदाज़ अपना अपना।।
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति
सर्वाधिकार सुरक्षित
उत्तराखंड।
